Delhi High Court: कोर्ट वीडियो विवाद में Google-Meta की दो टूक, ‘हर अपलोड पर नजर रखना संभव नहीं’
July 7, 2026 Source: Rashtra Wire
दिल्ली हाई कोर्ट में लंबित एक जनहित याचिका (PIL) की सुनवाई के दौरान Google और Meta ने अदालत के सामने साफ कहा कि वे कोर्ट की कार्यवाही के वीडियो की अनधिकृत रिकॉर्डिंग या सोशल मीडिया पर उसके प्रसार की स्वतः निगरानी नहीं कर सकते। कंपनियों का कहना है कि बिना किसी विशेष URL, लिंक या स्पष्ट पहचान के किसी विवादित कंटेंट को खोजकर हटाना तकनीकी रूप से संभव नहीं है। इसलिए उन्हें “सुपर सेंसर” की भूमिका निभाने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।
यह मामला आबकारी नीति से जुड़े केस की उस कथित वीडियो रिकॉर्डिंग से जुड़ा है, जिसमें पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा से सुनवाई से स्वयं को अलग करने का अनुरोध किया था। याचिका में आरोप लगाया गया है कि कोर्ट की कार्यवाही की रिकॉर्डिंग और उसे सोशल मीडिया पर साझा करना न्यायालय के नियमों का उल्लंघन है। इसी आधार पर अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया, संजय सिंह समेत अन्य नेताओं के खिलाफ अवमानना की कार्रवाई की मांग की गई है।
मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति वी. कामेश्वर राव और न्यायमूर्ति मनमीत पी.एस. अरोड़ा की खंडपीठ ने की। अदालत ने बताया कि सभी पक्षकारों को अभी नोटिस की तामील नहीं हो सकी है, इसलिए अगली सुनवाई 27 अगस्त को होगी।
अपने हलफनामे में Meta ने कहा कि उसके प्लेटफॉर्म पर रोजाना अरबों पोस्ट और वीडियो साझा किए जाते हैं। ऐसे में बिना स्पष्ट जानकारी के किसी कंटेंट की पहचान कर उसे हटाना संभव नहीं है। वहीं Google ने दलील दी कि YouTube पर हर घंटे लाखों वीडियो अपलोड होते हैं, इसलिए हर वीडियो की पहले से जांच करना व्यावहारिक नहीं है।
दोनों कंपनियों ने सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 79 का हवाला देते हुए कहा कि इंटरमीडियरी के रूप में उन्हें "सेफ हार्बर" सुरक्षा प्राप्त है। किसी सक्षम न्यायालय या अधिकृत सरकारी एजेंसी के आदेश अथवा वैध सूचना मिलने पर ही संबंधित कंटेंट के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाती है।