कब्जे में हस्तक्षेप पर रोक, बहू और बच्चों को हाई कोर्ट से मिली राहत
August 11, 2026 Source: Rashtra Wire
CG High Court : बिलासपुर. हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने मुस्लिम कानून के तहत संपत्ति के हिबा (उपहार) से जुड़े मामले में एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है, कि केवल उपहार विलेख का पंजीयन हो जाने से हिबा वैध नहीं हो जाता. वैध हिबा के लिए दानकर्ता की घोषणा, प्राप्तकर्ता की स्वीकृति और संपत्ति के कब्जे की प्रभावी सुपुर्दगी आवश्यक है. कोर्ट ने कहा कि यदि पूरी संपत्ति का कब्जा वास्तव में हस्तांतरित नहीं हुआ है, तो केवल दस्तावेज में कब्जा देने का उल्लेख पर्याप्त नहीं माना जा सकता I
मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रविंद्र कुमार अग्रवाल की डीबी ने रायपुर के खनिज नगर, पुरैना तेलीबांधा स्थित 1500 वर्गफीट की संपत्ति से जुड़े मामले में यह फैसला सुनाया है. अदालत ने रायपुर के 11वें जिला न्यायाधीश द्वारा दिए गए उस निर्णय और डिक्री को बरकरार रखा, जिसमें ससुर द्वारा पत्नी और बेटियों के पक्ष में की गई गिफ्ट डीड को शून्य घोषित किया गया था. कोर्ट ने संपत्ति विवाद में दायर प्रथम अपील खारिज कर दी I
मामला रायपुर के खनिज नगर, पुरैना-तेलीबांधा क्षेत्र का है. स्वर्गीय नौशाद अली की पत्नी नसीमा अली और उनके दो नाबालिग बच्चों ने ट्रायल कोर्ट में सिविल वाद दायर किया था. विवाद प्लाट नंबर 46, क्षेत्रफल 1,500 वर्गफुट से जुड़ा था. नसीमा के पति नौशाद अली अपने पिता रजब अली के इकलौते बेटे थे. वर्ष 2018 में नौशाद की मृत्यु हो गई. नसीमा का दावा था कि उनके पति ने अपनी कमाई और ऋण लेकर प्लाट के करीब 370 वर्गफुट हिस्से में मकान का निर्माण कराया था, जिसमें वह वर्ष 2005 में विवाह के बाद से लगातार रह रही थीं. नौशाद की मृत्यु के बाद रजब अली ने 27 मार्च 2019 को पूरी संपत्ति का पंजीकृत गिफ्ट डीड अपनी पत्नी और बेटियों के नाम कर दिया. इसके बाद नामांतरण कराया गया और बहू व बच्चों को मकान से बेदखल करने की कोशिश की गई. रजब अली और उनकी बेटियों की ओर से तर्क दिया गया कि संपत्ति रजब अली ने हाउसिंग बोर्ड से खरीदी थी और वे इसके एकमात्र स्वामी थे I
हाई कोर्ट ने मुस्लिम कानून के तहत हिबा के तीन आवश्यक तत्वों पर विशेष जोर दिया. अदालत के अनुसार दानकर्ता द्वारा उपहार की घोषणा, प्राप्तकर्ता द्वारा उसकी स्वीकृति और उपहार की गई संपत्ति के कब्जे की सुपुर्दगी-तीनों आवश्यक हैं. केवल उपहार विलेख तैयार या पंजीकृत कर देने से वैध Hiba साबित नहीं होता. अदालत ने पाया कि उपहार विलेख में कब्जा सौंपने का उल्लेख होने के बावजूद वादी पक्ष संपत्ति के करीब 370 वर्गफीट हिस्से पर लगातार काबिज था. प्रतिवादी यह साबित करने के लिए ठोस साक्ष्य पेश नहीं कर सके कि पूरी संपत्ति का वास्तविक और प्रभावी कब्जा उपहार प्राप्तकर्ताओं को सौंप दिया गया था I
कोर्ट ने यह भी महत्वपूर्ण माना कि उपहार विलेख चार लोगों के पक्ष में संयुक्त रूप से किया गया था, लेकिन उसमें प्रत्येक व्यक्ति का हिस्सा स्पष्ट रूप से निर्धारित नहीं था. संपत्ति का एक हिस्सा पहले से वादी पक्ष के कब्जे में था. ऐसे में अदालत ने मुस्लिम कानून में लागू ‘मुशा’ के सिद्धांत को भी प्रासंगिक माना. हालांकि हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि मुशा के सिद्धांत को हर मामले में यांत्रिक तरीके से लागू नहीं किया जा सकता. इस मामले में उपहार की वैधता पर सवाल केवल मुशा के आधार पर नहीं, बल्कि कब्जे की प्रभावी सुपुर्दगी साबित नहीं होने और वादी पक्ष के लगातार कब्जे सहित सभी परिस्थितियों को मिलाकर तय किया गया I
हाई कोर्ट ने कहा कि लंबे समय से संपत्ति पर शांतिपूर्ण कब्जे में रहने वाले व्यक्ति को केवल किसी विवादित दस्तावेज के आधार पर जबरन बेदखल नहीं किया जा सकता. यदि किसी पक्ष का संपत्ति पर बेहतर अधिकार होने का दावा है, तो उसे कानून के अनुसार उचित राहत हासिल करनी होगी. अदालत ने माना कि वादी पक्ष लंबे समय से संपत्ति के एक हिस्से में रह रहा था और उसके कब्जे में हस्तक्षेप किए जाने की आशंका थी. इसलिए स्थायी निषेधाज्ञा के जरिए उनके कब्जे की सुरक्षा करना उचित था I
हाई कोर्ट ने निष्कर्ष दिया कि प्रतिवादी यह साबित नहीं कर सके कि 27 मार्च 2019 का पंजीकृत उपहार विलेख मुस्लिम कानून के तहत हिबा की सभी आवश्यक शर्तों के अनुसार पूरा हुआ था. खास तौर पर पूरी संपत्ति के कब्जे की प्रभावी सुपुर्दगी साबित नहीं हुई. अदालत ने रायपुर के 11वें जिला न्यायाधीश के 24 नवंबर 2025 के फैसले और 27 नवंबर 2025 की डिक्री में हस्तक्षेप से इनकार करते हुए प्रथम अपील खारिज कर दी. निचली अदालत द्वारा उपहार विलेख को वादी पक्ष के लिए शून्य और बाध्यकारी नहीं मानने तथा उनके कब्जे में हस्तक्षेप पर रोक लगाने का आदेश बरकरार रखा गया I