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धर्म स्वातंत्र्य अधिनियम के तहत पहली सजा सुनाई गई, पूरा मामला समझें

May 5, 2026 Source: Rashtra Wire

धर्म स्वातंत्र्य अधिनियम के तहत पहली सजा सुनाई गई, पूरा मामला समझें
रायपुर में एक महत्वपूर्ण फैसले में अदालत ने धर्म स्वातंत्र्य अधिनियम के तहत प्रदेश की पहली सजा सुनाई है। रायपुर की इस घटना में आरोपी महिला ईश्वरी साहू को दोषी पाया गया, जिसने इलाज के नाम पर एक महिला को कथित तौर पर धर्मांतरित करने और झाड़-फूंक जैसे तरीकों से उपचार करने का दावा किया था। मामले के अनुसार, योगिता सोनवानी नाम की महिला को बीमारी के इलाज के लिए ईश्वरी साहू के पास ले जाया गया था। आरोपी खुद को चमत्कारी शक्तियों से संपन्न बताती थी और लोगों को अपने तथाकथित इलाज के जरिए प्रभावित करती थी। उसने योगिता का इलाज चमत्कारी तेल और गर्म पानी से किया। इलाज के दौरान योगिता की हालत लगातार बिगड़ती गई और अंततः उसकी मृत्यु हो गई। घटना के बाद पुलिस ने मामला दर्ज कर जांच शुरू की। जांच में सामने आया कि आरोपी लंबे समय से अंधविश्वास फैलाकर लोगों को गुमराह कर रही थी। वह झाड़-फूंक और अवैज्ञानिक तरीकों से इलाज करती थी, जिससे लोगों की जान को खतरा होता था। इस मामले में लापरवाही और अमानवीय व्यवहार स्पष्ट रूप से सामने आया। अदालत ने सभी साक्ष्यों और गवाहों के आधार पर ईश्वरी साहू को दोषी करार दिया। उसे भारतीय दंड संहिता की धारा 302 (हत्या) के तहत आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई। इसके अलावा, धर्म स्वातंत्र्य अधिनियम के तहत 1 वर्ष की अतिरिक्त सजा और टोनही प्रताड़ना के मामले में भी 1 वर्ष की सजा दी गई। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि समाज में फैल रहे अंधविश्वास और अवैज्ञानिक उपचार के खिलाफ एक सख्त संदेश भी देता है।